उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud pe jab dasht ki wahshat ko musallat karunga

ख़ुद पे जब दश्त की वहशत को मुसल्लत करूँगा

خود پہ جب دشت کی وحشت کو مسلط کروں گا

शायर: Tahzeeb Hafi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद पे जब दश्त की वहशत को मुसल्लत करूँगा
इस क़दर ख़ाक उड़ाऊँगा क़यामत करूँगा

हिज्र की रात मिरी जान को आई हुई है
बच गया तो मैं मोहब्बत की मज़म्मत करूँगा

जिस के साए में तुझे पहले पहल देखा था
मैं इसी पेड़ के नीचे तिरी बै'अत करूँगा

अब तिरे राज़ सँभाले नहीं जाते मुझ से
मैं किसी रोज़ अमानत में ख़यानत करूँगा

तेरी यादों ने अगर हाथ बटाया मेरा
अपने टूटे हुए ख़्वाबों की मरम्मत करूँगा

लैलतुल-क़द्र गुज़ारूँगा किसी जंगल में
नूर बरसेगा दरख़्तों की इमामत करूँगा