उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud apni parastish karte hain kuchh dair-o-haram se kaam nahin

ख़ुद अपनी परस्तिश करते हैं कुछ दैर-ओ-हरम से काम नहीं

خود اپنی پرستش کرتے ہیں کچھ دیر و حرم سے کام نہیں

शायर: Habibur Rahman Siddiqui7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद अपनी परस्तिश करते हैं कुछ दैर-ओ-हरम से काम नहीं
वो तर्ज़-ए-नियाज़-ए-ख़ास है ये जो कुफ़्र नहीं इस्लाम नहीं

हों पीर-ए-मुग़ाँ या शैख़-ए-हरम सब बाँध रहे हैं अपनी हवा
कहने को बहुत कुछ कहते हैं जो बात है उस का नाम नहीं

हम तोड़ दें क़ैद-ए-हस्ती भी ये क़ैद-ए-क़फ़स तो चीज़ है क्या
इक जुम्बिश-ए-क़ल्ब-ए-मुज़्तर में या हम ही नहीं या बाम नहीं

है जोश-ए-अता-ए-साक़ी भी कब वजह-ए-सुकून-ए-तिश्ना-लबी
या जाम ब-क़द्र-ए-बादा नहीं या बादा ब-क़द्र-ए-जाम नहीं

आज़ाद रहे नाकाम जिए पाबंद भला क्या शाद रहें
हो सहन-ए-चमन या कुंज-ए-क़फ़स हम को तो कहीं आराम नहीं

हिम्मत ही नहीं की वर्ना अभी इक जस्त में मंज़िल जा लेते
कटती है कहीं यूँ राह भला दो गाम चले दो गाम नहीं

क्या शाहिद-ए-राना छाँटा है अल्लाह-रे मेरी दीदा-वरी
ये हुस्न सर-ए-बाज़ार नहीं ये ज़ौक़-ए-तमाशा आम नहीं