उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHauf sa phir labon pe tari hai

ख़ौफ़ सा फिर लबों पे तारी है

خوف سا پھر لبوں پہ طاری ہے

शायर: Ejazulhaq Shahab10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ौफ़ सा फिर लबों पे तारी है
इक अजब कैफ़ियत हमारी है

आओ बदलें निज़ाम-ए-गुलशन हम
कुछ हमारी भी ज़िम्मेदारी है

रौशनी हक़ के एक जुगनू की
सैंकड़ों ज़ुल्मतों पे भारी है

आप का तो कोई जवाब नहीं
आइए अब हमारी बारी है

जश्न-ए-तदफ़ीन-ए-आरज़ू-ए-विसाल
और साँसों का रक़्स जारी है

वस्ल का एक क़ीमती लम्हा
हिज्र की मुद्दतों पे भारी है

वहशत-ए-इश्क़ में सुनो हम ने
दिन समेटा है शब उतारी है

क़हक़हों का नगर तुम्हें सौंपा
दर्द पर सल्तनत हमारी है

ग़लतियाँ आप से नहीं होतीं
क्या फ़रिश्तों से रिश्ता-दारी है

आप सुनिए 'शहाब' को भी कभी
गोया इल्हाम-ए-रब्त जारी है