उर्दू शायरी · ग़ज़ल

badan ki qabr mein KHwabon ki lash hai main hun

बदन की क़ब्र में ख़्वाबों की लाश है मैं हूँ

بدن کی قبر میں خوابوں کی لاش ہے میں ہوں

शायर: Ejazulhaq Shahab7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बदन की क़ब्र में ख़्वाबों की लाश है मैं हूँ
क़दम क़दम पे ही फ़िक्र-ए-म'आश है मैं हूँ

ज़माने भर में तो ये राज़ फ़ाश है मैं हूँ
मगर मुझे तो मिरी ही तलाश है मैं हूँ

हर एक ज़र्ब नए तज्रबे उकेरे है
हयात है कि कोई संग-तराश है मैं हूँ

लगेंगी बोलियाँ जन्नत की अब सर-ए-बाज़ार
बिकेगी ख़ुल्द-ए-बरीं उफ़ विनाश है मैं हूँ

जो वक़्त माज़ी में गुज़रा है काश रुक जाता
लबों पे आज फ़क़त लफ़्ज़-ए-काश है मैं हूँ

हर इक क़दम पे नई हसरतें पनपती हैं
न जाने कैसा ये इक मोह-पाश है मैं हूँ

क्यूँ लम्हा लम्हा ही बढ़ती ही जा रही है 'शहाब'
ये गुज़रे वक़्त की कैसी ख़राश है मैं हूँ