उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHalwat-e-yak-sard mein jab misl-e-aina khula

ख़ल्वत-ए-यक-सर्द में जब मिस्ल-ए-आईना खुला

خلوت یک سرد میں جب مثل آئینہ کھلا

शायर: Osaama ameer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ल्वत-ए-यक-सर्द में जब मिस्ल-ए-आईना खुला
क्या फ़रावानी लिए हम पर वो गंजीना खुला

ये रियाज़त ज़िंदगी भर की विसाल-आमेज़ है
जब वो पैराहन खुला तो शौक़-ए-देरीना खुला

किन ख़ुनुक-आसार मौसम में ये दिल माइल हुआ
जाम छलके जा रहे थे जब वो साज़ीना खुला

दहर हो या बज़्म हो कम-कम ही होता है करम
उस को ना-बीना न समझो जिस पे वो बीना खुला

वहशत-ए-आइंदगाँ में ख़ाक हैं सब ख़ाल-ओ-ख़द
इक नज़र भर कर जो देखा 'अक्स-ए-पारीना खुला

ख़ूब था पहर-ए-'इनायत अपनी हैरानी के साथ
आज ही की शब थी शायद जब वो आईना खुला