उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kai bar is ka daman bhar diya husn-e-do-alam se

कई बार इस का दामन भर दिया हुस्न-ए-दो-आलम से

کئی بار اس کا دامن بھر دیا حسن دو عالم سے (ردیف .. ی)

शायर: Faiz Ahmad Faiz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कई बार इस का दामन भर दिया हुस्न-ए-दो-आलम से
मगर दिल है कि इस की ख़ाना-वीरानी नहीं जाती

कई बार इस की ख़ातिर ज़र्रे ज़र्रे का जिगर चेरा
मगर ये चश्म-ए-हैराँ जिस की हैरानी नहीं जाती

नहीं जाती मता-ए-लाल-ओ-गौहर की गिराँ-याबी
मता-ए-ग़ैरत-ओ-ईमाँ की अर्ज़ानी नहीं जाती

मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से
बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती

सर-ए-खुसरव से नाज़-ए-कज-कुलाही छिन भी जाता है
कुलाह-ए-ख़ुसरवी से बू-ए-सुल्तानी नहीं जाती

ब-जुज़ दीवानगी वाँ और चारा ही कहो क्या है
जहाँ अक़्ल ओ ख़िरद की एक भी मानी नहीं जाती