उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi rauzanon se pukarna kabhi dar ke chaak se dekhna

कभी रौज़नों से पुकारना कभी दर के चाक से देखना

کبھی روزنوں سے پکارنا کبھی در کے چاک سے دیکھنا

शायर: Yaqoob Tasawwur7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी रौज़नों से पुकारना कभी दर के चाक से देखना
सर-ए-बज़्म उस का कभी मुझे बड़े इंहिमाक से देखना

अगर उस के हुस्न-ओ-जमाल का छिड़े तज़्किरा कभी बज़्म में
तो फिर उस के रुख़ पे हिजाब के कई रंग पाक से देखना

ये मिरा उसूल ग़लत सही मिरी ज़िंदगी की असास है
कि जिसे भी देखना दोस्तो नज़र-ए-तपाक से देखना

मिरी तरह लौट के आए जब है यही नसीब-ए-बहार भी
गुल-ओ-बर्ग फ़र्श पे मुंतशिर तो शजर हलाक से देखना

कभी हुस्न-ए-पैकर-ए-ज़ीस्त पर जो नज़र पड़े ज़हे तज्ज़िया
तो फिर आइनों में कुछ अक्स भी बड़े शर्मनाक से देखना

है दुआ कि क़ुव्वत-ए-सब्र ताक़त-ए-ज़ब्त जुज़्व-ए-हयात हो
यहाँ वाक़िआ'त क़दम क़दम हैं जो ख़ौफ़नाक से देखना

गुल-ए-नम से पैकर-ए-ज़ीस्त में हमें मुंतक़िल जो किया गया
तो सभी मनाज़िर-ए-ज़िंदगी हैं निगाह-ए-ख़ाक से देखना