उर्दू शायरी · ग़ज़ल

agar sab sach ke matwale hue hain

अगर सब सच के मतवाले हुए हैं

اگر سب سچ کے متوالے ہوئے ہیں

शायर: Yaqoob Tasawwur8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अगर सब सच के मतवाले हुए हैं
ज़बाँ पर क़ुफ़्ल क्यों डाले हुए हैं

सुना है चोरियाँ हो जाएँगी बंद
कि अब रहज़न ही रखवाले हुए हैं

ग़ुबार-आलूद है फ़स्ल-ए-बहाराँ
गुल-ए-ख़ुश-रंग मटियाले हुए हैं

इक अन-जाना सा डर है दिल पे तारी
कि दुश्मन अब तो घर वाले हुए हैं

सरों की है ज़रूरत वक़्त को फिर
बुलंद हर सम्त से भाले हुए हैं

पहाड़ अपनी जगह क़ाएम हैं अब तक
क़यामत को अभी टाले हुए हैं

मुझे भी हो बशारत मंज़िलों की
मिरे पाँव में भी छाले हुए हैं

जवाज़-ए-ख़ौफ़ क्या हो अब 'तसव्वुर'
इन्ही हालात के पाले हुए हैं