उर्दू शायरी · ग़ज़ल

josh har mauj mein uchhaal ka tha

जोश हर मौज में उछाल का था

جوش ہر موج میں اچھال کا تھا

शायर: Zafar Aziz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जोश हर मौज में उछाल का था
हौसला हम में भी कमाल का था

लोग क्यों अपनी सम्त भूल गए
सूई का रुख़ अगर शुमाल का था

हो गए मेरे रास्ते रौशन
ये उजाला तिरे जमाल का था

मैं ने भी अपने फन निकाल लिए
उस का अंदाज़ इश्तिआ'ल का था

मस्जिदों में दुआएँ ठहर गईं
वक़्त शायद अभी ज़वाल का था

नाम-ए-महबूब पर ही जाँ दे दी
इश्क़ तो हज़रत-ए-बिलाल का था

हम भी रखते थे सर पे ताज 'ज़फ़र'
जब करम रब्ब-ए-ज़ुल-जलाल का था