उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo be-ghar hain unhen ghar ki dua deti hain diwaren

जो बे-घर हैं उन्हें घर की दुआ देती हैं दीवारें

جو بے گھر ہیں انہیں گھر کی دعا دیتی ہیں دیواریں

शायर: Zafar Iqbal Zafar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो बे-घर हैं उन्हें घर की दुआ देती हैं दीवारें
फिर अपने साए में उन को सुला देती हैं दीवारें

असीरी ही मुक़द्दर है तो कोई क्या करे आख़िर
मुक़य्यद कर के अपने में सज़ा देती हैं दीवारें

हमारी ज़ीस्त में ऐसे भी लम्हे आते हैं अक्सर
दरारों के तवस्सुत से हवा देती हैं दीवारें

मिरी चीख़ें फ़सीलों से कभी बाहर नहीं जातीं
शिकस्ता हो के गिरने पर सदा देती हैं दीवारें

मयस्सर घर नहीं जिन को जो राहों में भटकते हैं
'ज़फ़र' उन को मकानों का पता देती हैं दीवारें