उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jidhar bhi dekhiye har su hamein aghyar milte hain

जिधर भी देखिए हर सू हमें अग़्यार मिलते हैं

جدھر بھی دیکھیے ہر سو ہمیں اغیار ملتے ہیں

शायर: Ejaz Quraishi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिधर भी देखिए हर सू हमें अग़्यार मिलते हैं
जहाँ पर हम क़दम रक्खें वहीं पर ख़ार मिलते हैं

सुनाऊँ माजरा-ए-ग़म किसे इस ग़म के आलम में
कि इस नगरी के बासी जान से बेज़ार मिलते हैं

हज़ारों साथ देते हैं ख़ुशी के वक़्त में पैहम
कि जब क़िस्मत बिगड़ती है कहाँ फिर यार मिलते हैं

ख़िज़ाँ ने कर दिया पामाल या-रब गुलशन-ए-हस्ती
कि हर जानिब हमें उजड़े हुए गुलज़ार मिलते हैं

न घबरा ऐ दिल-ए-मुज़्तर ये दस्तूर-ए-ज़माना है
मोहब्बत करने वालों को फ़क़त आज़ार मिलते हैं

नसीम-ए-सुब्ह गुलशन में नए ग़ुंचे खिलाती है
सभी अहल-ए-मोहब्बत अहल-ए-दिल सरशार मिलते हैं

कभी ऐसा भी एजाज़-ए-मोहब्बत रंग दिखाता है
तलब की राह में अक्सर हमें ग़म-ख़्वार मिलते हैं