उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jangal jangal shauq se ghumo dasht ki sair mudam karo

जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो

جنگل جنگل شوق سے گھومو دشت کی سیر مدام کرو

शायर: Ibn-e-Insha5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो
'इंशा'-जी हम पास भी लेकिन रात की रात क़याम करो

अश्कों से अपने दिल को हिकायत दामन पर इरक़ाम करो
इश्क़ में जब यही काम है यार वले के ख़ुदा का नाम करो

कब से खड़े हैं बर में ख़िराज-ए-इश्क़ के लिए सर-ए-राहगुज़ार
एक नज़र से सादा-रुख़ो हम सादा-दिलों को ग़ुलाम करो

दिल की मताअ' तो लूट रहे हो हुस्न की दी है ज़कात कभी
रोज़-ए-हिसाब क़रीब है लोगो कुछ तो सवाब का काम करो

'मीर' से बैअ'त की है तो 'इंशा' मीर की बैअ'त भी है ज़रूर
शाम को रो रो सुब्ह करो अब सुब्ह को रो रो शाम करो