उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jabin pe dagh-e-siyah KHwahishon ke dar ka tha

जबीं पे दाग़-ए-सियह ख़्वाहिशों के दर का था

جبیں پہ داغ سیہ خواہشوں کے در کا تھا

शायर: Kalam Aazar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जबीं पे दाग़-ए-सियह ख़्वाहिशों के दर का था
हर एक शख़्स गुनह-गार अपने घर का था

सदफ़ से छुट के मुक़य्यद हुआ ज़माने में
शिकार मैं भी 'अजब तंगी-ए-नज़र का था

'अक़ीदा टूट रहा था क़फ़स-परस्तों का
सभी को ख़ौफ़ मिरे बढ़ते बाल-ओ-पर का था

थी अच्छे-अच्छों की दस्तार उस के क़ब्ज़े में
कमाल ये भी 'अजब दस्त-ए-बे-हुनर का था

गुनाह-गार असालीब थे ज़बान न थी
फ़साद शहर-ए-सुख़न में दिल-ओ-नज़र का था

तमाम 'उम्र हवाएँ लड़ी हैं 'आज़र' से
मगर ये शख़्स बला के दिल-ओ-नज़र का था