उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab tak itne qurb se dekha na tha

जब तक इतने क़ुर्ब से देखा न था

جب تک اتنے قرب سے دیکھا نہ تھا

शायर: Ehsan Ali Khan6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब तक इतने क़ुर्ब से देखा न था
फ़ासलों के हुस्न को समझा न था

ज़ीस्त तो क्या मौत का यारा न था
क़ब्र महँगी थी कफ़न सस्ता न था

तुझ से क्या शिकवा कि ऐसी थी फ़ज़ा
तू ही क्या हर आश्ना बेगाना था

सैकड़ों ग़म-हा-ए-दुनिया किस लिए
क्या तिरा ग़म हासिल-ए-दुनिया न था

बिक गए बाज़ार में जिस्म-ओ-दिमाग़
दिल वो बाग़ी था कि बिक सकता न था

किस ने खे़मे की तनाबें काट दीं
दश्त में तो कोई हम-साया न था