उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab KHanjar-e-qatil se na inkar hua chup

जब ख़ंजर-ए-क़ातिल से न इंकार हुआ चुप

جب خنجر قاتل سے نہ انکار ہوا چپ

शायर: Rafi Sirsivi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब ख़ंजर-ए-क़ातिल से न इंकार हुआ चुप
आख़िर मिरे हाथों का तलबगार हुआ चुप

शमशीर-ए-क़लम मौत के बाज़ार से गुज़रा
तारीख़ बताए कहाँ किरदार हुआ चुप

ये देख के मैदाँ में परेशाँ है सितमगर
मक़्तूल नहीं ख़ंजर-ए-खूँ-ख़्वार हुआ चुप

उस इश्क़-ए-हक़ीक़ी की दुआ माँगिये भाई
जो नोक-ए-सिनाँ पर न सर-ए-दार हुआ चुप

की मिम्बर-ए-लब से जो तबस्सुम में ख़िताबत
सज्दे में गिरे तीर कमाँ-दार हुआ चुप

आँखें न हुईं बंद कभी दस्त-ए-अजल से
ये बात अलग तालिब-ए-दीदार हुआ चुप

सय्याद को नींद आए ये मुमकिन ही कहाँ था
बेड़ी न कभी तौक़-ए-गिराँ-बार हुआ चुप

जब उस का सवाल आ गया तन्क़ीद की ज़द में
सकते में ग़ुरूर आ गया दरबार हुआ चुप

मालूम न थी उस को मिरे अश्कों की निस्बत
क़ीमत जो बताई तो ख़रीदार हुआ चुप

अश्कों से किया मातम-ए-मज़लूम सर-ए-आम
बे-नुत्क़ भी हो कर न अज़ादार हुआ चुप