उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab bhi humse qarz ulfat ka ada ho jaega

जब भी हम से क़र्ज़ उल्फ़त का अदा हो जाएगा

جب بھی ہم سے قرض الفت کا ادا ہو جائے گا

शायर: Iftikhar Hussain Ifti6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब भी हम से क़र्ज़ उल्फ़त का अदा हो जाएगा
हम बिछड़ जाएँगे तुझ से और क्या हो जाएगा

हाथ की उलझी लकीरों से ये जाना है कि अब
हम जहाँ जिस से मिले वो बेवफ़ा हो जाएगा

आदमी के सामने झुकने का फ़न अच्छा नहीं
जिस के आगे तू झुका वो देवता हो जाएगा

क्या 'अजब तदबीर है तेरी ख़ुदाओं के ख़ुदा
जो ख़ुदा बनने नहीं आया ख़ुदा हो जाएगा

ज़िंदगी से रंज-ओ-ग़म जितने मिले हैं सब क़ुबूल
जब भी हम उन से मिलेंगे ग़म दवा हो जाएगा

बद-गुमाँ होने से 'इफ़ती' लाख बेहतर है कि तुम
पूछ लेना उन से सब जब सामना हो जाएगा