उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jaan rahe nochte hayat ke dukh

जाँ रहे नोचते हयात के दुख

جاں رہے نوچتے حیات کے دکھ

शायर: Zafar Rabab7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जाँ रहे नोचते हयात के दुख
ज़ात के और काएनात के दुख

कुछ बिगाड़ा न वक़्त ने इन का
हैं जवाँ अब भी मेरे साथ के दुख

रोज़-मर्रा का बन गए मामूल
रोज़-मर्रा मुआ'मलात के दुख

फ़तह ने भी शिकस्त-ओ-रेख़्त ही दी
जीत से मुंसलिक थे मात के दुख

रह गया अब जुनूँ ही कम-आमेज़
इश्क़ में तो हैं बात बात के दुख

हम ग़रीबों के रोज़-ओ-शब न पूछ
दिन में भी जागते हैं रात के दुख

टूटने में ही आफ़ियत थी 'रबाब'
झेलता कौन एहतियात के दुख