उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jage se kitne ghar dekhe raat ki KHamushi mein

जागे से कितने घर देखे रात की ख़ामुशी में

جاگے سے کتنے گھر دیکھے رات کی خامشی میں

शायर: Vandana Bhardwaj Tiwary Vani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जागे से कितने घर देखे रात की ख़ामुशी में
दीवार पे साए ही तो थे रात की ख़ामुशी में

गुल-बूटे और बाग़ जब सो जाते हैं ख़्वाबों को ओढ़े
तब रात रानी ही ख़ुशबू दे रात की ख़ामुशी में

दिन भर ख़ुद अपनी लगाई आतिश में दिल जल रहा था
अब शम्अ सा बुझ रहा है ये रात की ख़ामुशी में

तन्हाई में चुभते हैं जब यादों के नश्तर से अक्सर
गोशे में हम रोते हैं खुल के रात की ख़ामुशी में

गर नींद है तो फिर इन जलती आँखों में तू उतर आ
गर मौत है तो ले चल याँ से रात की ख़ामुशी में

काटी नहीं जाती अब मुझ से हिज्र की लम्बी रातें
कोई मिरे दिल को बहला दे रात की ख़ामुशी में

हो झील में चाँद उतरा या ख़्वाब में खोई 'वानी'
सब अपने ही अश्क से भीगे रात की ख़ामुशी में