उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ishq ke hathon mein parcham ke siwa kuchh bhi nahin

'इश्क़ के हाथों में परचम के सिवा कुछ भी नहीं

عشق کے ہاتھوں میں پرچم کے سوا کچھ بھی نہیں

शायर: Urooj Zaidi Badayuni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'इश्क़ के हाथों में परचम के सिवा कुछ भी नहीं
उस का 'आलम तेरे 'आलम के सिवा कुछ भी नहीं

बे-यक़ीनी सू-ए-ज़न ईमान-ए-नाक़िस की दलील
फ़िक्र-ए-राहत खतरा-ए-ग़म के सिवा कुछ भी नहीं

हम से पूछो हम बताएँ ग़ायत-ए-कौन-ओ-मकाँ
कारगाह-ए-इब्न-ए-आदम के सिवा कुछ भी नहीं

आतिश-ए-नफ़रत से अब दुनिया है ऐसे मोड़ पर
दीदा-वर गो ये जहन्नम के सिवा कुछ भी नहीं

याद-ए-अय्यामे कि ये भी जान-ए-रज़्म-ओ-बज़्म थे
जिन के पास अब चश्म-ए-पुर-नम के सिवा कुछ भी नहीं

हम नहीं मिनजुमला-ए-अहल-ए-रज़ा क्यूँ कर कहें
जिन के लब पर क़िस्सा-ए-ग़म के सिवा कुछ भी नहीं

अहल-ए-दुनिया के लिए जो अब्र-ए-नैसाँ था 'उरूज'
अब वो इंसाँ अश्क-ए-शबनम के सिवा कुछ भी नहीं