उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek yahi shaghl to main dam hama-dam karta hun

इक यही शग़्ल तो मैं दम हमा-दम करता हूँ

اک یہی شغل تو میں دم ہمہ دم کرتا ہوں

शायर: Osaama ameer7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक यही शग़्ल तो मैं दम हमा-दम करता हूँ
दश्त के बा'द तिरे कूचे में रम करता हूँ

चश्म बे-ख़्वाबी के 'आलम से गुज़रती है मिरी
और मैं ख़्वाब-ए-म'आनी को रक़म करता हूँ

ख़्वाह वो ज़ात में आईना-ए-ख़ुद-सर कहलाए
मैं बहर-हाल बड़े नाज़-ओ-नि'अम करता हूँ

मैं सर-ए-बज़्म तिरी शोख़ी-ए-वहशत के हुज़ूर
जाँ खपाता हूँ बहुत तब कोई ग़म करता हूँ

रंग-ओ-फ़रहंग से तस्ख़ीर ज़ियादा न हुई
और पहले से मैं उम्मीद भी कम करता हूँ

सर-बसर ‘उम्र-ए-दो-रोज़ा तो मुझे सहल नहीं
इक अलग वज़' से मैं ख़ुद को बहम करता हूँ

कब वो पैग़ाम-रसा हो कि मुझे सब्र नहीं
काकुल-ए-ख़म के लिए शे'र रक़म करता हूँ