उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek tilismi sa wo manzar gir paDa

इक तिलिस्मी सा वो मंज़र गिर पड़ा

اک طلسمی سا وہ منظر گر پڑا

शायर: Zafar Tabish5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक तिलिस्मी सा वो मंज़र गिर पड़ा
मेरे हाथों से समंदर गिर पड़ा

मैं सुकूत-ए-शब में उलझा ही रहा
इक सितारा मेरे अंदर गिर पड़ा

मैं ने पूछा जब पहाड़ों का मिज़ाज
जिस्म से मेरे मिरा सर गिर पड़ा

इक सुनहरी धात का टुकड़ा मिला
जिस को छूते ही गदागर गिर पड़ा

देखने निकला था वो ख़ुद को मगर
आइनों के घर में जा कर गिर पड़ा