उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aangan-angan jari dhup

आँगन-आँगन जारी धूप

آنگن انگن جاری دھوپ

शायर: Zafar Tabish7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँगन-आँगन जारी धूप
मेरे घर भी आरी धूप

क्या जाने क्यूँ जलती है
सदियों से बिचारी धूप

किस के घर तू ठहरेगी
तू तो है बंजारी धूप

अब तो जिस्म पिघलते हैं
जारी जा अब जारी धूप

छुप गई काले बादल में
मौसम से जब हारी धूप

हो जाती है सर्द कभी
और कभी चिंगारी धूप

आज बहुत है अँधियारा
चुपके से आ जारी धूप