उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek aaine ke samne rakkha charagh ko

इक आइने के सामने रक्खा चराग़ को

اک آئنے کے سامنے رکھا چراغ کو

शायर: Faiz Alam Babar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक आइने के सामने रक्खा चराग़ को
मैं चाहता था चेहरा दिखाना चराग़ को

कल शब उदास रौशनी इतनी बुरी लगी
मैं ने उठा के फेंक दिया था चराग़ को

ख़ुद-सोज़ी करते देख न पाया बुझा दिया
मैं ने हवा की आँख से देखा चराग़ को

हमराज़ तीरगी वही हमराज़ रौशनी
जिस ने तमाम ज़िंदगी परखा चराग़ को

तारा गिरा है टूट के 'बाबर' ज़मीन पर
या मेरी सम्त चाँद ने फेंका चराग़ को