उर्दू शायरी · ग़ज़ल

husn ko be-naqab dekha hai

हुस्न को बे-नक़ाब देखा है

حسن کو بے نقاب دیکھا ہے

शायर: Bal Swaroop Rahi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुस्न को बे-नक़ाब देखा है
ज्यूँ खुली आँख ख़्वाब देखा है

कैसा हैरानगी का 'आलम है
फ़र्श पर माहताब देखा है

आप पहलू बदल के अंगड़ाए
या कोई इंक़लाब देखा है

आप दीखे तो ये लगा जैसे
आरज़ू का शबाब देखा है

चश्म-ए-नर्गिस में लाज के डोरे
या कि जाम-ए-शराब देखा है

नाज़ किस बात पर तुझे है गुल
हम ने तेरा जवाब देखा है

आशियाँ को क़फ़स समझते हैं
हम सा ख़ाना-ख़राब देखा है

साथ काँटों के जो नहीं 'राही'
आज ऐसा गुलाब देखा है