उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil ki har aarzu nakaam hui jati hai

दिल की हर आरज़ू नाकाम हुई जाती है

دل کی ہر آرزو ناکام ہوئی جاتی ہے

शायर: Bal Swaroop Rahi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल की हर आरज़ू नाकाम हुई जाती है
ज़िंदगी दर्द का पैग़ाम हुई जाती है

कैसे मुमकिन है सज़ा प्यार की मुझ को न मिले
हर सफ़ाई मिरी इल्ज़ाम हुई जाती है

किस ने आँगन में खड़े हो के ये ज़ुल्फ़ें खोलीं
रोज़-ए-रौशन है मगर शाम हुई जाती है

ज़िक्र आते ही तिरा देखते सब मेरी तरफ़
तू तो अब मेरी ही हमनाम हुई जाती है

ज़िंदगी हाथ में थी ज़हर का प्याला मेरे
तेरे हाथों में मगर जाम हुई जाती है

हम डुबा आए स्वयम् अपनी ही कश्ती 'राही'
तू तो बेकार ही बदनाम हुई जाती है