उर्दू शायरी · ग़ज़ल

husn ke zer-e-bar ho ki na ho

हुस्न के ज़ेर-ए-बार हो कि न हो

حسن کے زیر بار ہو کہ نہ ہو

शायर: Ghalib Ayaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुस्न के ज़ेर-ए-बार हो कि न हो
अब ये दिल बे-क़रार हो कि न हो

मर्ग-ए-अम्बोह देख आते हैं
आँख फिर अश्क-बार हो कि न हो

कर्ब-ए-पैहम से हो गया पत्थर
अब ये सीना फ़िगार हो कि न हो

फिर यही रुत हो ऐन मुमकिन है
पर तिरा इंतिज़ार हो कि न हो

शाख़-ए-ज़ैतून के अमीं हैं हम
शहर में इंतिशार हो कि न हो

शेर मेरे संभाल कर रखना
अब ग़ज़ल मुश्क-बार हो कि न हो