उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hijr ki shab jo tabiat kabhi ghabrai hai

हिज्र की शब जो तबीअत कभी घबराई है

ہجر کی شب جو طبیعت کبھی گھبرائی ہے

शायर: Ibraheem Khaleel5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हिज्र की शब जो तबीअत कभी घबराई है
तू न आया तो तेरी याद बहुत आई है

पुर-ख़तर कितनी ये माहौल की तन्हाई है
दिल से इक बात न निकली थी कि इक आई है

दस्त-ए-उल्फ़त दिल-ए-बे-कल की तरफ़ यूँ लाए
कोई समझे ये तिरा नाज़ है अंगड़ाई है

हादसे हैं अभी कितने इसी ख़तरे के तहत
इस में रुस्वाई है इस में तिरी रुस्वाई है

वो तिरे सर की क़सम खाते हैं या'नी कि 'ख़लील'
एक काफ़िर ने मुसलमाँ की क़सम खाई है