उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum ek Dhalti hui dhup ke taaqub mein

हम एक ढलती हुई धूप के त'आक़ुब में

ہم ایک ڈھلتی ہوئی دھوپ کے تعاقب میں

शायर: Kaif Ahmed Siddiqui5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम एक ढलती हुई धूप के त'आक़ुब में
हैं तेज़-गाम साए-साए जाते हैं

चमन में शिद्दत-ए-दर्द-ए-नुमूद से ग़ुंचे
तड़प रहे हैं मगर मुस्कुराए जाते हैं

मैं वो ख़िज़ाँ का बरहना-बदन शजर हूँ जिसे
लिबास-ए-ज़ख़्म-ए-बहाराँ पिन्हाए जाते हैं

शफ़क़ की झील में जब भी है डूबता सूरज
तो पास धूप ही जाती न साए जाते हैं

ये ज़िंदगी वो तड़पती ग़ज़ल है 'कैफ़' जिसे
हर एक साज़-ए-हवादिस पे गाए जाते हैं