उर्दू शायरी · ग़ज़ल

guzar jae jo aankhon se wo phir manzar nahin rahta

गुज़र जाए जो आँखों से वो फिर मंज़र नहीं रहता

گزر جائے جو آنکھوں سے وہ پھر منظر نہیں رہتا

शायर: Parvindar shokh6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुज़र जाए जो आँखों से वो फिर मंज़र नहीं रहता
जुदा हो कर जुदा होने का कोई डर नहीं रहता

मिटें बेचैनियाँ आख़िर दर-ओ-दीवार की कैसे
घरों में लोग रहते हैं दिलों में घर नहीं रहता

दिखाई किस तरह दे शहर में कोई मुझे आख़िर
सिवा उस के नज़र में अब कोई मंज़र नहीं रहता

ये हैरत है के मुझ को ग़म नहीं है उस को खो कर भी
परेशाँ वो भी है वो ख़ुश मुझे पा कर नहीं रहता

नहीं देती इजाज़त झूट कहने की ये ख़ुद्दारी
अगर सच बोलते हैं महफ़िलों में सर नहीं रहता

जिसे वो 'शोख़' अपने हाथ से छू कर गुज़र जाए
वो पथर फिर ज़ियादा देर तक पत्थर नहीं रहता