उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aazmane zist ki jab talKHiyan aa jaengi

आज़माने ज़ीस्त की जब तल्ख़ियाँ आ जाएँगी

آزمانے زیست کی جب تلخیاں آ جائیں گی

शायर: Parvindar shokh8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आज़माने ज़ीस्त की जब तल्ख़ियाँ आ जाएँगी
रू-ब-रू सारी हमारी ख़ामियाँ आ जाएँगी

शर्त ये है आप के हाथों सजाएँ गुल-दान में
फूल काग़ज़ के भी हों तो तितलियाँ आ जाएँगी

बे-ज़बाँ रहने का सारा लुत्फ़ ही खो जाएगा
ज़द में आवाज़ों के जब ख़ामोशियाँ आ जाएँगी

सूख जाएँगे समुंदर जब भी बाहर के कभी
घर में मेरे हसरतों की मछलियाँ आ जाएँगी

चिलचिलाती धूप में वो जब भी आएँगे नज़र
एक पल में शहर में फिर सर्दियाँ आ जाएँगी

आँख में महबूब की शिद्दत से देखो झाँक कर
शा'इरी की सब तुम्हें बारीकियाँ आ जाएँगी

याद कर के वस्ल के पल काट लेंगे ज़िंदगी
दरमियाँ जब भी हमारे दूरियाँ आ जाएँगी

अस्ल में तो तब ही होगा 'शोख़' उस का इम्तिहाँ
सामने जब प्यार के मजबूरियाँ आ जाएँगी