उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gori ab tu aap samajh le hum sajan ya dushman hain

गोरी अब तू आप समझ ले हम साजन या दुश्मन हैं

گوری اب تْو آپ سمجھ لے ہم ساجن یا دشمن ہیں

शायर: Ibn-e-Insha7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गोरी अब तू आप समझ ले हम साजन या दुश्मन हैं
गोरी तू है जिस्म हमारा हम तेरा पैराहन हैं

नगरी नगरी घूम रहे हैं सख़ियो अच्छा मौक़ा' है
रूप-सरूप की भिक्षा दे दो हम तो फैला दामन हैं

तेरे चाकर हो कर पाया दर्द बहुत रुस्वाई बहुत
तुझ से थे ये टके कमाए आज तुझी को अर्पण हैं

लोगो मैले तन मन धन की हम को सख़्त मनाही है
लोगो हम इस छूत से भागें हम तो खरे बरहमन हैं

पूछो खेल बनाने वाले पूछो खेलने वाले से
हम क्या जानें किस की बाज़ी हम जो पत्ते बावन हैं

सहरा से जो फूल चुने थे उन से रूह मो'अत्तर है
अब जो ख़ार समेटा चाहें बस्ती बस्ती गुलशन हैं

दो दो बूँद को अपनी खेती तरसी है और तरसेगी
कहने को तो दोस्त हमारे भादों हैं और सावन हैं