उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gareban ko rafu karne lage hain

गरेबाँ को रफ़ू करने लगे हैं

گریباں کو رفو کرنے لگے ہیں

शायर: Jahangeer Khan Jauhar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गरेबाँ को रफ़ू करने लगे हैं
नवाज़िश ख़ूब-रू करने लगे हैं

क़यामत है लब-ए-नाज़ुक से अपने
वो शरह-ए-आरज़ू करने लगे हैं

सर-ए-मक़्तल न जाने किस का ख़ूँ है
फ़रिश्ते भी वुज़ू करने लगे हैं

न जाने सूझी क्या बैठे बिठाए
तुम्हारी आरज़ू करने लगे हैं

निगाहों से कभी जो बोलते थे
ज़बाँ से गुफ़्तुगू करने लगे हैं

अज़ल से गुम है जो पर्दों में 'जौहर'
उसी की जुस्तुजू करने लगे हैं