उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gale se der talak lag ke roen abr-o-sahab

गले से देर तलक लग के रोएँ अब्र-ओ-सहाब

گلے سے دیر تلک لگ کے روئیں ابر و سحاب

शायर: Aamir Suhail10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गले से देर तलक लग के रोएँ अब्र-ओ-सहाब
हटा दिए हैं ज़मान-ओ-मकाँ के हम ने हिजाब

लहद की मिट्टी की तक़दीर की अमान मैं दूँ
सफ़ेद लट्ठे में कफ़ना के सुर्ख़ शाख़-ए-गुलाब

मैं आसमान तिरे जिस्म पे बिछा देता
मगर ये नील में चादर बनी नहीं कमख़ाब

तिरा वो रातों को उठ कर सिसक सिसक रोना
लहू में नींद की टीसें पलक पे इज्ज़ के ख़्वाब

तिरे जलाए दियों में भड़कती आग का फेर
ज़मीं की रेहल पे रक्खे न रौशनी की किताब

हवा बहिश्त के बाग़ों की ज़ुल्फ़ ज़ुल्फ़ फिरे
तिरी लहद तिरे बालीं के गर्द जू-ए-शराब

कमान खींच ज़माने की सू-ए-सीना-ज़नाँ
ऐ फ़र्क़-ए-नाज़ गले से उतार तौक़-ए-ग़याब

मैं एक यख़-ज़दा माथे को चूम कर दम-ए-सुब्ह
तिरी ज़मीनों से गुज़रूँगा ऐ जहान-ए-ख़राब

मशक़्क़ती हैं तिरे काख़-ओ-कू-ए-हिज्र के हम
ऐ कार-ख़ाना-ए-अफ़्लाक-ओ-ख़ाक-ओ-आब-ओ-सराब

ये तंग-ओ-तार-गढ़ा नूर से भरे 'आमिर'
सदा रहे तेरे हुजरे में हाला-ए-माहताब