उर्दू शायरी · ग़ज़ल

falak pe sham Dhale jo chamakne lagte hain

फ़लक पे शाम ढले जो चमकने लगते हैं

فلک پہ شام ڈھلے جو چمکنے لگتے ہیں

शायर: Ejaz Ahmad Ejaz8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़लक पे शाम ढले जो चमकने लगते हैं
वो तेरी आँखों में आ कर दमकने लगते हैं

सुकूत-ए-शब मैं तिरा नाम जब भी लेता हूँ
सहीफ़े इश्क़ के दिल पर उतरने लगते हैं

ग़मों की काली घटाओं को चीर कर जानाँ
तिरी तजल्ली के सूरज दहकने लगते हैं

चमन चमन में खिले फूल ले के नाम तिरा
तसव्वुरात के गुलशन महकने लगते हैं

तिरी सदाओं के घुंघरू फ़ज़ा में यूँ छनके
कि जैसे बाग़ में बुलबुल चहकने लगते हैं

तू बे-इरादा भी जब ज़ुल्फ़ अपनी झटकाए
सुलगते दश्त पे बादल बरसने लगते हैं

तू जान तोड़ के लेती है जब भी अंगड़ाई
ख़ुतूत-ए-जिस्म ख़ला में उभरने लगते लगते हैं

तिरे जुनूँ का भी 'एजाज़' क्या मुदावा हो
कि छील लेते हो जब ज़ख़्म भरने लगते हैं