उर्दू शायरी · ग़ज़ल

falak pe chand dharti par nazare raqs karte hain

फ़लक पे चाँद धरती पर नज़ारे रक़्स करते हैं

فلک پہ چاند دھرتی پر نظارے رقص کرتے ہیں

शायर: Erum Zehra6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़लक पे चाँद धरती पर नज़ारे रक़्स करते हैं
मैं शब को बाम पर आऊँ सितारे रक़्स करते हैं

तिरे आने पे जो अक्सर ख़ुशी से मैं पकडती हूँ
मिरे हाथों को छूकर वो ग़ुबारे रक़्स करते हैं

शब-ए-फ़ुर्क़त को मैं जब ज़िंदगी में जोड़ना चाहूँ
जुदाई में उठाए जो ख़सारे रक़्स करते हैं

कभी हाथों में ले कर हाथ हम चलते हैं साहिल पर
जो पाँव पानी में रक्खें किनारे रक़्स करते हैं

न जाने क्यों अचानक अपनी आँखें बंद करती हूँ
तिरे शानों पे जब गेसू हमारे रक़्स करते हैं

कभी नज़रें चुरा कर तेरी जानिब देख लेती हूँ
तिरी आँखों में देखूँ तो इशारे रक़्स करते हैं