उर्दू शायरी · ग़ज़ल

etibar-e-wada-e-zahmat ki nadani gai

ए'तिबार-ए-वा'दा-ए-ज़हमत की नादानी गई

اعتبار وعدۂ زحمت کی نادانی گئی

शायर: Urooj Zaidi Badayuni14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ए'तिबार-ए-वा'दा-ए-ज़हमत की नादानी गई
आज तक जो दिल में थी वो कुफ़्र-सामानी गई

वक़्त के हमराह अपनी कैफ़-सामानी गई
देखते ही देखते आसाइश अर्ज़ानी गई

हुस्न-ए-बे-परवा को इन बातों से दिलचस्पी नहीं
कौन पूछे दर-ब-दर की ख़ाक क्यों छानी गई

आदमी बदनाम था लेकिन गुलों की ये रविश
हम समझते थे कि रस्म-ए-चाक-दामानी गई

दोस्तो पहचान की नज़रें ही शायद बुझ गईं
आश्ना-सूरत भी जब तुम से न पहचानी गई

अब तो मैं हूँ और अपना एहतिसाब-ओ-जाएज़ा
हर किताब-ए-ज़ीस्त की औराक़-गर्दानी गई

स'ई-ए-ज़ब्त-ए-ग़म के तुम हो इक निशान-ए-मो'तबर
सिर्फ़ इतनी बात पर चेहरे की वीरानी गई

दीदनी है सह्र-कारी-ए-हरीम-ए-काफ़िरी
कैसे कैसे पारसा की पाक-दामानी गई

क्या समझ कर तुम पशेमान-ए-शिकस्त-ए-'अह्द हो
शुक्र है तकलीफ़-ए-एहसास-ए-परेशानी गई

ऐ निगाह-ए-इल्तिफ़ात-ए-दोस्त ये क्या हो गया
जो मिरे शे'रों में थी वो शो'ला-सामानी गई

आज तक तो 'अर्ज़-ए-ग़म पर ज़ब्त के पहरे रहे
किस कमी से उस तवज्जोह की फ़रावानी गई

मेरे गिर्द-ओ-पेश था सौत-ओ-सदा का इक हुजूम
इस फ़ज़ा में भी मिरी आवाज़ पहचानी गई

धूप में तो हम थे लेकिन क़िस्मत-ए-अहल-ए-दुवल
जिस जगह हाजत न थी चादर वहाँ तानी गई

ऐ 'उरूज' अब 'आम है शिकवा 'अदम-तर्सील का
'मीर'-ओ-'मोमिन' के ज़माने की ग़ज़ल-ख़्वानी गई