उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dusron ki aankh le kar bhi pashemani hui

दूसरों की आँख ले कर भी पशेमानी हुई

دوسروں کی آنکھ لے کر بھی پشیمانی ہوئی

शायर: Ejaz Obaid5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दूसरों की आँख ले कर भी पशेमानी हुई
अब भी ये दुनिया हमें लगती है पहचानी हुई

अश्क की बे-रंग खेती मुद्दतों में लहलहाई
पहले कितना क़हत था अब कुछ फ़रावानी हुई

ख़ुद को हम पहचान पाए ये बहुत अच्छा हुआ
जिस्म के हैजान में रूहों की 'उर्यानी हुई

मैं तो इक ख़ुशबू का झोंका तेरे दामन का ही था
बू-ए-गुल से आ मिला क्यूँ तुझ को हैरानी हुई

उस का बाज़ार-ए-हवस में क़द्र-दाँ ही कौन था
जिंस-ए-दिल की फिर यहाँ क्यूँ इतनी अर्ज़ानी हुई