उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil kisi samt kisi samt qadam jata hai

दिल किसी सम्त किसी सम्त क़दम जाता है

دل کسی سمت کسی سمت قدم جاتا ہے

शायर: Tahzeeb Hafi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल किसी सम्त किसी सम्त क़दम जाता है
तेरे मौजूद के चक्कर में अदम जाता है

और तो कुछ नहीं होता तिरे मिलने से मगर
एक तूफ़ान-ए-त'अल्लुक़ है जो थम जाता है

मुझ को सावन में कभी ख़त न रवाना करना
जाते जाते तिरे मक्तूब से नम जाता है

इस लिए बोला उसे ख़ुद से परे जाने का
जिस तरफ़ हम उसे कहते हैं वो कम जाता है

रक़्स-ए-दोशीज़ा-ए-दुनिया पे नज़र पड़ते ही
जाम-ए-जमशेद मिरे हाथ में जम जाता है

किसी दिल से किसी पहलू से किसी दुनिया से
आदमी जाता है कब रंज-ओ-अलम जाता है

नग़्मा-ए-तूल-ए-शब-ए-हिज्र मिरे बस का नहीं
मैं अगर लय को पकड़ता हूँ तो सम जाता है

हाथ उठा लूँ तो तिरी ख़ुशबू चली जाएगी
सर झटक दूँ तो तिरा दस्त-ए-सितम जाता है

बाज़ औक़ात हवाओं के तआ'क़ुब के लिए
मैं न जाऊँ तो मिरा नक़्श-ए-क़दम जाता है