उर्दू शायरी · ग़ज़ल

diwanon se ye mat puchho diwanon pe kya guzri hai

दीवानों से ये मत पूछो दीवानों पे क्या गुज़री है

دیوانوں سے یہ مت پوچھو دیوانوں پہ کیا گزری ہے

शायर: Qamar Jalalabadi3 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दीवानों से ये मत पूछो दीवानों पे क्या गुज़री है
हाँ उन के दिलों से ये पूछो अरमानों पे क्या गुज़री है

औरों को पिलाते रहते हैं और ख़ुद प्यासे रह जाते हैं
ये पीने वाले क्या जानें पैमानों पे क्या गुज़री है

मालिक ने बनाया इंसाँ को इंसान मोहब्बत कर बैठा
वो ऊपर बैठा क्या जाने इंसानों पे क्या गुज़री है