उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dip jalta hai aur na bujhta hai

दीप जलता है और न बुझता है

دیپ جلتا ہے اور نہ بجھتا ہے

शायर: Kaif Ahmed Kaifi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दीप जलता है और न बुझता है
ताक़-ए-हिज्राँ में जब से रक्खा है

मेरे मौला नवाज़ दे मुझ को
मेरी क़िस्मत में जितना लिक्खा है

सब की नज़रों में फ़ित्ना-गर लेकिन
अपनी नज़रों में वो फ़रिश्ता है

आदमी की बिसात इतनी सी
वक़्त के हाथ में खिलौना है

तू जो 'कैफ़ी' है शा'इर-ए-बेबाक
कह ग़ज़ल में जो तुझ को कहना है