उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dayar-e-shauq mein aae the ek KHwab ke sath

दयार-ए-शौक़ में आए थे एक ख़्वाब के साथ

دیار شوق میں آئے تھے ایک خواب کے ساتھ

शायर: Zaeem Rasheed7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दयार-ए-शौक़ में आए थे एक ख़्वाब के साथ
गुज़र रही है मुसलसल किसी अज़ाब के साथ

हम अहल-ए-दर्द पुकारे गए सहीफ़ों में
हम अहल-ए-इश्क़ उतारे गए किताब के साथ

फिर एक शाम पज़ीराई चश्म-ए-तर की हुई
फिर एक शाम गुज़ारी गई जनाब के साथ

हमें ये ख़ौफ़ अंधेरे निगल न जाएँ कहीं
सो हम ने जिस्म को ढाँपा है आफ़्ताब के साथ

मुकालिमा रहा जारी हमारी आँखों का
बदन की शाख़ पे खिलते हुए गुलाब के साथ

कुछ और चाहिए तिश्ना-लबी मिटाने को
ये प्यास वो है जो बुझती नहीं शराब के साथ

'ज़ईम' वो मिरी दरिया-दिली से डरता है
वो मुझ से मिलता है लेकिन बड़े हिसाब के साथ