उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bahaar-e-chashm tere husn ki bahaar se lun

बहार-ए-चश्म तिरे हुस्न की बहार से लूँ

بہار چشم ترے حسن کی بہار سے لوں

शायर: Chandu Lal Bahadur Shadan5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बहार-ए-चश्म तिरे हुस्न की बहार से लूँ
शमीम लूँ तो तिरी ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बार से लूँ

नहीं है काम किसी ग़ैर से मुझे हरगिज़
जो कुछ भी लूँ तो ये लालच है अपने यार से लूँ

मुझे है काम इसी से किसी को कब जानूँ
मिले जो एक से तो किस लिए हज़ार से लूँ

नहीं लड़ी है मिरी आँख दूसरे की तरफ़
मज़ा नज़ारे का इस चश्म-ए-पुर ख़ुमार से लूँ

शब-ए-विसाल मयस्सर है क्यूँ न ऐ 'शादाँ'
अयाग़ बादा-ए-गुल-रंग गुल-इज़ार से लूँ