उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bazar-e-jihaalat mein suKHan bech raha hun

बाज़ार-ए-जिहालत में सुख़न बेच रहा हूँ

بازار جہالت میں سخن بیچ رہا ہوں

शायर: Chander Wahid5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बाज़ार-ए-जिहालत में सुख़न बेच रहा हूँ
ये गीत ये नग़्मात ये फ़न बेच रहा हूँ

है कोई ख़रीदार तो आवाज़ लगाए
रोटी के एवज़ शेर-ओ-सुख़न बेच रहा हूँ

क्या दाम लगाते हो चलो तुम ही बताओ
सच्चाई का अनमोल रतन बेच रहा हूँ

पुरखों ने बनाया था जिसे लाख जतन से
तहज़ीब-ओ-अदब का वो भवन बेच रहा हूँ

तुम ठीक ही कहते थे तिजारत नहीं आसाँ
अब कौन ख़रीदे जो सुख़न बेच रहा हूँ