उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aks-dar-aks hai chehron ki numudari se

अक्स-दर-अक्स है चेहरों की नुमूदारी से

عکس در عکس ہے چہروں کی نموداری سے

शायर: Lateef Ahmad Subhani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अक्स-दर-अक्स है चेहरों की नुमूदारी से
आइना देखते हैं लोग भी बे-ज़ारी से

फिर भी इल्ज़ाम कई आ गए सर पर अपने
मैं गुरेज़ाँ तो रहा वक़्त की अय्यारी से

बुग़्ज़ है हिर्स है ग़ीबत है रिया-कारी है
जिस क़दर भी हो रहो दूर ही बीमारी से

बट के रह जाता है इंसान कई हिस्सों में
मश्ग़ले पैदा अजब होते हैं बेकारी से

बे-सबब गिरता नहीं आदमी नज़रों से कभी
बद-कलामी के सबब या कभी मक्कारी से

ना-मुकम्मल है ग़ज़ल ग़म की महारत के बग़ैर
हुस्न आता है कहाँ शे'रों में फ़नकारी से

लोग गिरवीदा मिरे यूँही नहीं आज 'लतीफ़'
दिल को जीता है रवाबित से रवा-दारी से