उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajab si be-kali se chur koi

अजब सी बे-कली से चूर कोई

عجب سی بے کلی سے چور کوئی

शायर: Sabiha Saba4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजब सी बे-कली से चूर कोई
कुछ अपने दिल से है मजबूर कोई

कभी ऐसी अनोखी सोच उभरे
कि जैसे सोच पर मा'मूर कोई

वो जिन के दम से रौशन ज़िंदगी है
दिलों में उन के होगा नूर कोई

तुम्हें कैसे भुलाया जा सकेगा
यहाँ ऐसा नहीं दस्तूर कोई