उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ahwal-e-ranj bazm mein kahna muhaal hai

अहवाल-ए-रंज बज़्म में कहना मुहाल है

احوال رنج بزم میں کہنا محال ہے

शायर: Madhav Noor5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अहवाल-ए-रंज बज़्म में कहना मुहाल है
कहते हैं ख़ूब शे'र कहा है कमाल है

कितना हसीं उरूज है कैसा जमाल है
लेकिन अज़ल से तय है कि इक दिन ज़वाल है

शायद वो इक सराब है लेकिन मैं क्या करूँ
मेरा वही है दश्त में पुर्सान-ए-हाल है

पूछा गया है मुझ से तिरा कौन है ख़ुदा
या-रब्ब-ए-आलमीन ये कैसा सवाल है

डरने का दे दिया है वबा ने नया सबब
बाक़ी हर एक ख़ौफ़ यहाँ हस्ब-ए-हाल है