उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aastinon se KHanjar gira do

आस्तीनों से ख़ंजर गिरा दो

آستینوں سے خنجر گرا دو

शायर: Ejaz Tabish6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आस्तीनों से ख़ंजर गिरा दो
शाख़-ए-ज़ैतून हर-सू उगा दो

शर्म आती है अब तो ये कहते
आदमी आदमी को बना दो

रूह-ए-इंसानियत मुज़्तरिब है
वक़्त के ज़ालिमों को सज़ा दो

आहटें यास की आ रही हैं
साज़-ए-उम्मीद की लय बढ़ा दो

आइने सब जिला खो चुके हैं
अब फ़रेमों में पत्थर सजा दो

छा चुके हैं जो क़ल्ब-ओ-नज़र पर
उन अँधेरों को 'ताबिश' मिटा दो