उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aashiyan jal gaya, gulsitan luT gaya, hum qafas se nikal kar kidhar jaenge

आशियाँ जल गया, गुल्सिताँ लुट गया, हम क़फ़स से निकल कर किधर जाएँगे

آشیاں جل گیا، گلستاں لٹ گیا، ہم قفس سے نکل کر کدھر جائیں گے

शायर: Raaz Allahabadi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आशियाँ जल गया, गुल्सिताँ लुट गया, हम क़फ़स से निकल कर किधर जाएँगे
इतने मानूस सय्याद से हो गए, अब रिहाई मिलेगी तो मर जाएँगे

और कुछ दिन ये दस्तूर-ए-मय-ख़ाना है, तिश्ना-कामी के ये दिन गुज़र जाएँगे
मेरे साक़ी को नज़रें उठाने तो दो, जितने ख़ाली हैं सब जाम भर जाएँगे

ऐ नसीम-ए-सहर तुझ को उन की क़सम, उन से जा कर न कहना मिरा हाल-ए-ग़म
अपने मिटने का ग़म तो नहीं है मगर, डर ये है उन के गेसू बिखर जाएँगे

अश्क-ए-ग़म ले के आख़िर किधर जाएँ हम, आँसुओं की यहाँ कोई क़ीमत नहीं
आप ही अपना दामन बढ़ा दीजिए, वर्ना मोती ज़मीं पर बिखर जाएँगे

काले काले वो गेसू शिकन-दर-शिकन, वो तबस्सुम का आलम चमन-दर-चमन
खींच ली उन की तस्वीर दिल ने मिरे, अब वो दामन बचा कर किधर जाएँगे