उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aankh lagti bhi nahin hai ki jaga deta hai

आँख लगती भी नहीं है कि जगा देता है

آنکھ لگتی بھی نہیں ہے کہ جگا دیتا ہے

शायर: Zaheer Alam6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँख लगती भी नहीं है कि जगा देता है
कोई दरवाज़े की ज़ंजीर हिला देता है

घर से निकलो तो पता जेब में रख कर निकलो
हादिसा चेहरे की पहचान मिटा देता है

हम जो बढ़ते हैं कभी अम्न का परचम ले कर
रास्तों में कोई बारूद बिछा देता है

तुम सदाक़त की घनी छाँव में पी कर देखो
ज़हर सच्चाई का अमृत का मज़ा देता है

मौत के लब पे फ़ुसूँ-कार हँसी आती है
जब किसी को कोई जीने की दुआ देता है

मस्लहत से नहीं ख़ाली ये ज़माना 'आलम'
बे-ग़रज़ कोई किसी को यहाँ क्या देता है