उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaKHir aisi bhi kya KHata hai meri

आख़िर ऐसी भी क्या ख़ता है मिरी

آخر ایسی بھی کیا خطا ہے مری

शायर: Raakesh ulfat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आख़िर ऐसी भी क्या ख़ता है मिरी
कितनी तकलीफ़-दह सज़ा है मिरी

तेरे मज़हब में आस्था है मिरी
तू भी सैकूलर हो कामना है मिरी

मेरे सीने से मेरा दिल ही नहीं
धड़कनों को भी ले गया है मिरी

पहले ज़ख़्मों पे ज़ख़्म देता है
और फिर ख़ैर माँगता है मिरी

तेरी दीवानी सारी दुनिया है
तू मिरी ही रहे दुआ है मिरी

मेरा हिन्दोस्ताँ बदन है मिरा
और पंजाब आत्मा है मिरी

वो भी अपने ही मन का मालिक है
मैं समझता था मानता है मिरी